वो इश्क़ ही क्या जिसमे दिल बर्बाद ना हो,
आँख खुली हो और मेहबूब का ख्वाब ना हो |
मिलूं जिससे भी अब वही हँसता है ,
हर मोड़ पे लगे की ये वही रास्ता है|
यहाँ सावरीं थी जुल्फ उसने,
यहाँ बाल खुले छोड़ दिए थे |
यहाँ हाथ पे हाथ रखा था,
यहाँ दोनो ने इतरा के मुह मोड़ लिए थे |
दिन मुझे दिनों में नहीं , लम्हों में याद हैं,
ना यादाश्त खुदा किसी को ऐसी दे,
यही फ़रियाद है |
आँख खुली हो और मेहबूब का ख्वाब ना हो |
मिलूं जिससे भी अब वही हँसता है ,
हर मोड़ पे लगे की ये वही रास्ता है|
यहाँ सावरीं थी जुल्फ उसने,
यहाँ बाल खुले छोड़ दिए थे |
यहाँ हाथ पे हाथ रखा था,
यहाँ दोनो ने इतरा के मुह मोड़ लिए थे |
दिन मुझे दिनों में नहीं , लम्हों में याद हैं,
ना यादाश्त खुदा किसी को ऐसी दे,
यही फ़रियाद है |
Wah bajandar tha dost
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