आज बड़े दिनों बाद मुलाकात हुई हिंदी से,
कहने को तो रोज़ यही बोलते हैं, पर अचानक अहसास हुआ,
की कितनी गैर हो गयी है हमारी हिंदी |
हर दूसरा शब्द या तो अकरयोनीम है या स्लैंग,
कहते थे गालियां मात्र भाषा में ही अछि लगती हैं ,
पर अब वो भी इम्पोर्ट होने लगी हैं |
सब्द जैसे टोह लेना, मोह लेना , नतमस्तक होना या गदगद होना,
पर शायद ये सब किताबी हिंदी ही रह गयी है |
पर इस अंओरिजिनल वर्ल्ड में कुछ ओरिजिनल का मज़्ज़ा कुछ और है |
आज बड़े दिनों बाद मुलाकात हुई हिंदी से |
कहने को तो रोज़ यही बोलते हैं, पर अचानक अहसास हुआ,
की कितनी गैर हो गयी है हमारी हिंदी |
हर दूसरा शब्द या तो अकरयोनीम है या स्लैंग,
कहते थे गालियां मात्र भाषा में ही अछि लगती हैं ,
पर अब वो भी इम्पोर्ट होने लगी हैं |
सब्द जैसे टोह लेना, मोह लेना , नतमस्तक होना या गदगद होना,
पर शायद ये सब किताबी हिंदी ही रह गयी है |
पर इस अंओरिजिनल वर्ल्ड में कुछ ओरिजिनल का मज़्ज़ा कुछ और है |
आज बड़े दिनों बाद मुलाकात हुई हिंदी से |
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