वो मिटटी के मकान को खूबसूरत सा नाम देता है,
कभी हरे कभी कसरी रंग में सान देता है ,
वही ईंट वही पत्थर , वही फुलवारी का बागीचा,
न जाने अंदर रहने वाला कौन शक्श है,
पर बहार बड़े बड़े अक्षोरो में लिखा है,
वो इस सने हुए रंग पे अपनी जान देता है.
कभी हरे कभी कसरी रंग में सान देता है ,
वही ईंट वही पत्थर , वही फुलवारी का बागीचा,
न जाने अंदर रहने वाला कौन शक्श है,
पर बहार बड़े बड़े अक्षोरो में लिखा है,
वो इस सने हुए रंग पे अपनी जान देता है.
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